शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009


इंदौर से प्रकाशित दैनिक अखबार नईदुनिया में आज रवीन्द्र व्यास द्वारा लिया मेरा इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है। मैं उसे यहां अविकल प्रकाशित कर रहा हूं।

हमने अपने गांवों को साहित्य, मीडिया और फिल्मों में पूरी तरह से भूला दिया है। आज तथाकथित मुख्यधारा के सिनेमा में जो गांव बताए जाते हैं, वे गांव की एक नकली और रूमानी तस्वीर पेश करते हैं। गांव का यथार्थ कहीं ज्यादा भयावह और पीड़ादायी है। आज हालात ये हैं कि हम अपने शहर से दस किलोमीटर दूर के गांव के जीवन के बारे में भी ठीक से नहीं जानते। गांवों और शहरों के बीच दूरी न केवल बढ़ी है बल्कि इनके बीच खाई ज्यादा गहरी हुई है। यह कहना है शहर के युवा कहानीकार सत्यनारायण पटेल का। उन्हें हाल ही में मध्यप्रदेश साहित्य सम्मेलन के वागीश्वरी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें उनके पहले कहानी संग्रह भीम का भेरू मांगता कुल्हाड़ी ईमान पर दिया गया है जिसमें ज्यादातर कहानियां मालवा के गांवों पर केंद्रित हैं।
भोपाल में यह सम्मान उन्हें हिंदी के ख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने दिया। इंदौर लौटने पर उन्होंने नईदुनिया से बातचीत करते हुए कहा कि मेरी हरदम यह कोशिश रही है कि मैं अपनी कहानियों में अपने आसपास के यथार्थ को रचनात्मक ढंग से अभिव्यक्त करूं। दलितों पर अन्याय हो या राजनीति के छल-कपट, सांप्रदायिकता हो या अर्थव्यस्था का कोई कुरूप चेहरा, मैं इन्हीं विषयों को अपनी कहानी का केंद्र बनाता हूं और यथार्थवादी तरीके से उन्हें व्यक्त करता हूं। मैं उपेक्षित गांवों के उपेक्षित, वंचित और शोषित लोगों के जीवन के संघर्ष को अभिव्यक्त करता हूं। पुरस्कार मिलने से पहले भी और अब पुरस्कार मिलने के बाद भी मैं अपने समय, समाज और शोषित लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को गहरे महसूस करता हूं और चाहता हूं कि उनके शोषण के खिलाफ और उनके हक में खड़ाकर होकर उनके जीवन को रच सकूं। आज इरादतन ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई कहानियों और कहानीकारों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। आज ऐसी कहानियां भी लिखी जा रही हैं जिसका हमारे समय-समाज से कोई सीधा और जीवंत नाता नहीं है।
हिंदी के ख्यात कहानीकार उदय प्रकाश से लेकर युवा कहानीकार पंकज मित्र की कहानियों को पसंद करने वाले सत्यनारायण का मानना है कि गांवों में हो रहे तमाम तरह के शोषण को मैं यथार्थवादी तरीके से ही व्यक्त करने की कोशिश करता हूं ताकि हाहाकारी यथार्थ किसी शैली में न उलझे और अपनी पूरी तीव्रता से पाठकों को महसूस हो सके। सत्यनारायण की कहानियां हिंदी की ख्यात लघु पत्रिकाअों जैसे हंस, कथादेश, साक्षात्कार, वसुधा, बयां, कल के लिए और शब्द संगत में प्रकाशित हो चुकी हैं। इन दिनों वे अपनी कुछ छोटो कहानियों पर काम कर रहे हैं और अगले साल अपना नया कहानी संग्रह लाने की तैयारी भी कर रहे हैं। उन्होंने मध्यप्रदेश लेखक संगठन की इंदौर ईकाई के सचिव पद से कुछ मुद्दों पर मतभेद के कारण इस्तीफा दे दिया है।

इंदौर से प्रकाशित दैनिक अखबार नईदुनिया में आज रवीन्द्र व्यास द्वारा लिया मेरा इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है। मैं उसे यहां अविकल प्रकाशित कर रहा ह...